Tuesday, 29 December 2015

मेरे बग़ैर?




मैंने पुकारा तुझे, तेरा नाम लिए बग़ैर, तू जो साँसों में रवाँ था मेरा साथ निभाए बग़ैर,

मेरा सब्र की इंतिहा देखिये, करती रही ज़िक्र तेरा सरे महफ़िल, तेरा नाम लिए बग़ैर।


तू जब साथ था तब भी साथी कहाँ था, तेरी हसरतें जहाँन भर की काफ़ी थी, मेरे बग़ैर,

मुझे ख़बर थी अंजाम-ए-मुहब्बत की, तंहा ही सफ़र गुज़रेगा ज़िंदगी का मेरी, तेरे बग़ैर।

मुस्कुराती रही ख़ामोशियो की ओढ़ कर चादर, किसी से भी शिकवे-शिकायतें, तेरी किए बग़ैर, 

वो महमां है फिर लौट जाएगा अपनी मंज़िल, मैंने बेलौस मुहब्बत की, हिज्र की सोचे बग़ैर।


कोई इतना भी तंहा होता होगा कहीं, के धड़कने ख़ुद की सुन सके, कोई शोर हुए बग़ैर,

मुहब्बत है बेपनाह और दुआएँ बेअसर, विसाल-ए-यार हो कैसे, किसी मुअज्ज़े के बग़ैर।


सब कुछ पास होके भी एक ख़ालीपन हमसाया-सा है, हँसना सिख लिया, ख़ुश हुए बग़ैर,

हयात-ए-सफ़र मे छू कर बुलन्दियाँ, कभी तुझे भी खलती है कमी कोई, मेरे बग़ैर?






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